“Never never never give up.” – Winston Churchill
आत्महत्या अखबार के पन्नों पर छपने वाली सामान्य हैडलाइन है। जिसे हम कभी चाव से पढ़ते है कभी यू ही पलट देते है। यह बातें जितनी सामान्य लगती है , उतनी ही असामान्य होती है आत्महत्या करने वाले के जीवन में।
आपने कभी पशुओं को आत्महत्या करते हुये सुना है, नही ना। पशु यांत्रिक वृति के साथ जन्म लेते है और मर जाते है। उनको एक फिक्स्ड प्रोग्राम मिला होता है जिसके जरिये वो काम करते है। मनुष्य बिना किसी फिक्स्ड प्रोग्राम के जन्म लेता है। वो अपने जीवन की तैयारियां खुद करता है। नये नये इक्षाओं का जन्म परिस्थियों के अनुसार उसके अंदर होता है। उन इक्षाओं की पूर्ति के लिये वो संघर्षरत रहता है। जब तक सारी व्यवस्था उसके साथ होती है , उसके अनुरूप होती है वो ठीक ठाक होता है, और जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल नही होती, उसके हल्के बदलाव से वो व्याकुल होने लगता है। तभी शुरू होता है तनाव, डिप्रेशन और धीरे धीरे वो या तो दूसरे की हत्या कर देता है या फिर अपनी हत्या कर लेता है। दूसरे की हत्या करने से वो डरता है, क्योकि समाज के कड़े कानून उसको डराते है, इसलिये उस परिस्थिति में आत्महत्या करने एक मात्र ऑप्शन दिख रहा होता है।
आपने कभी पशुओं को आत्महत्या करते हुये सुना है, नही ना। पशु यांत्रिक वृति के साथ जन्म लेते है और मर जाते है। उनको एक फिक्स्ड प्रोग्राम मिला होता है जिसके जरिये वो काम करते है। मनुष्य बिना किसी फिक्स्ड प्रोग्राम के जन्म लेता है। वो अपने जीवन की तैयारियां खुद करता है। नये नये इक्षाओं का जन्म परिस्थियों के अनुसार उसके अंदर होता है। उन इक्षाओं की पूर्ति के लिये वो संघर्षरत रहता है। जब तक सारी व्यवस्था उसके साथ होती है , उसके अनुरूप होती है वो ठीक ठाक होता है, और जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल नही होती, उसके हल्के बदलाव से वो व्याकुल होने लगता है। तभी शुरू होता है तनाव, डिप्रेशन और धीरे धीरे वो या तो दूसरे की हत्या कर देता है या फिर अपनी हत्या कर लेता है। दूसरे की हत्या करने से वो डरता है, क्योकि समाज के कड़े कानून उसको डराते है, इसलिये उस परिस्थिति में आत्महत्या करने एक मात्र ऑप्शन दिख रहा होता है।
मनोविज्ञान और आत्महत्या -
सुविख्यात फ्रांसीसी समाज शास्त्री एमिल दुर्खिम कहते हैं कि आत्महत्या बहुत कुछ व्यक्ति का समाज के साथ सम्बन्ध, समाज की स्थिरता, अस्थिरता और समाज में संव्याप्त मूल्यों पर निर्भर करती है, जिससे कि व्यक्ति घिरा होता है। इस आधार पर अपनी पुस्तक ‘द स्यूसाइड’ में वह आत्महत्या को 4 रूपों में वर्गीकृत करते हैं, (1) एनामिक स्यूसाइड (2) इगोइस्टिक स्यूसाइड और (3) इल्ट्रइस्टिक स्यूसाइड (4 ) फैटलिस्टिक स्यूसाइड+
उनके अनुसार एनामिक स्यूसाइड तब होते हैं,(Not enough regulation)-जब सामाजिक संतुलन बुरी तरह से प्रभावित होता है। अमेरिका में 1931 के दौरान ‘ग्रेट डिप्रेशन’ का एक युग आया। जिसमें आत्महत्या की दर 10 से 16 प्रतिशत बढ़ गई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में अपने शत्रु से घिरे आस्ट्रियावासियों में आत्महत्या की यह वृत्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ी थी।
ेगोइस्टिक सुसाइड को समझने के लिए कार्ल मेनिंजर के व्याख्या को समझना होगा , मेनिंजर के अनुसार जीने की इच्छा ‘सुपर ईगो’ में विद्यमान स्वाभिमान के भाव पर निर्भर करती है। जब यह स्वाभिमान किसी भी कारण वश न्यून हो जाता है, तो आहत व्यक्ति भूखे व परित्यक्त शिशु की स्थिति में स्वयं को पाता है। जो समाविष्ट वस्तु का विनाश चाहता है। आत्महत्या क्षरा उस प्रिय वस्तु के नाश में सफल हो जाता है। जिसके समावेश ने सुपर ईगो की रचना में सहायता की थी। अपनी पुस्तक ‘मैन एगेन्स्ट हिमसेल्फ’ में मेनिंजर लिखते हैं कि व्यक्ति में किसी के प्रति हिंसा की भावना का अंत तीन रूपों में होता है, (1) मारने की इच्छा (2) मारे जाने की इच्छा और (3) मरने की इच्छा।
आत्महत्या का तीसरा स्वरूप है एल्ट्रइस्टिक स्यूसाइड। (Too much integration) किसी समाज या संस्कृति के मूल्य उसके व्यवस्था तंत्र के कारण होते हैं। इन मूल्यों में गड़बड़ी के कारण व्यक्ति समाज या अपने परिवार कुटुँब के बंधनों में इतना जकड़ जाता है कि उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं बचता। अपने देश, जाति व समाज के नाम पर भावावेश में वह प्राणों का उत्सर्ग कर देता है भारत की सतीप्रथा व जापान की हाराकिरी इसके उदाहरण है। वियतनाम युद्ध में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा आत्महत्या व 1907 में जिम जोन के सौ से भी अधिक अनुयायियों द्वारा युयाना में आत्महत्या इसी के अन्य उदाहरण हैं।
फैटलिस्टिक स्यूसाइड -(Too much regulation. )- इसमें व्यक्ति अपने आप को पूरी तरह से जकड़ा हुआ पता है। जैसे वह कोई गुलाम हो।
मनःविशेषज्ञों के अनुसार आत्महत्या एक आक्रमण कृत्य है, जिसमें व्यक्ति का स्वयं को समाप्त करने के पीछे दूसरों को दुख देने का भाव निहित रहता है। सिगमन फ्रायड ने आत्महत्या पर सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक अध्ययन व शोध किया था। फ्रायड ने इसे आक्रामक वृत्ति का रूप माना है. फ्रायड के अनुसार मन के तनाव के कारण इंसान जब उसे अविव्यक्त नहीं कर पाता है तो वह अवसाद ग्रस्त होता है, और यही बोझ उसे आत्महत्या की ओर उकसाती है ।
कार्ल मेनिंजर के अनुसार आत्महत्या व्यक्ति के रचनात्मक पक्ष पर उसके ध्वंसात्मक पक्ष की जीत है।
मनोवैज्ञानिक एल्फ्रेड एडलर आत्महत्या के कारण के रूप में मन में चल रहे द्वंद्वों की अपेक्षा व्यक्ति एवं समाज के बीच संबंधों को अधिक महत्व देते हैं। सामाजिक संबंध के बिना जीवन निरर्थक एवं निरुद्देश्य हो जाता है और आत्महत्या की ओर प्रेरित होता है।
मानव मन के मर्मज्ञ बौमेस्टर आत्महत्या को स्व से बचने या भागने का प्रयास का परिणाम मानते हैं। अपनी गलतियों कमियों व दुर्बलताओं के असहनीय अनुभवों के बोध से भागते ऐसे लोग अंततः ऐसी स्थिति में प्रवेश कर जाते हैं, जिसमें आत्महत्या के दुष्परिणाम के बारे में सोचने का अधिक श्रम करने की परवाह नहीं करते।
सुविख्यात मनीषी रोला के अनुसार मृत्यु ही जीवन को पूर्ण मूल्य देती है। अतः मृत्यु की निश्चितता हमें जीवन को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित करती है, जिससे कि हम अपनी क्षमताओं व शक्तियों का अधिकतम विकास व उपयोग कर सकें। इस संदर्भ में आत्महत्या जीवन से हार व इसे वृथा बरबाद करने का कृत्य है, क्योंकि इससे जीवन की समूची क्षमताओं की अनुभूति पर तुषारापात हो जाता है।
ब्राँस के अनुसार सभी आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि छोटी -छोटी आत्महत्याओं द्वारा बनती है। जिनमें व्यक्ति दूसरों से कटता जाता है, जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेता है और जीवन मूल्यों की खोज बंद कर देता है। इस तरह आत्महत्या का अंतिम कुकृत्य अवास्तविक निर्णयों की एक लंबी शृंखला का परिणाम होता है।
एबनॉर्मल साइकोलॉजी इरविन और बखरा सरासान लिखते हैं कि 9 प्रतिशत व्यक्ति आत्महत्या करते समय किसी न किसी मनोरोग के शिकार होते हैं। मनोरोग में अवसाद व मूढ़ विकास को प्रमुख कारण माना गया है। इसके बाद व्यक्तित्व दोष एवं मादक द्रव्यों के सेवन को भी आत्महत्या का प्रमुख कारण बतलाया गया है। व्यक्तित्व दोष में समस्या के समाधान में अक्षमता, रचनात्मक दृष्टिकोण का अभाव, बिगड़े अंतर्वैयक्तिक संबंध, शरीर व मनःरोगों पर नियंत्रण का अभाव, सामाजिक सामंजस्य का अभाव आदि हो सकते हैं। अमेरिका में ऐसे 2379 व्यक्तियों पर किए गए अध्ययन के दौरान पाया गया है कि इनमें 98 प्रतिशत किसी न किसी प्रकार से रुग्ण थे। इनमें 94 प्रतिशत मनःरोग से पीड़ित थे।
एक आश्चर्यजनक तथ्य अध्ययन के दौरान उभरकर आया है कि अवसाद की गहनतम दशा से उबरने के दौरान ही आत्महत्या के अधिकाँश निर्णय लिए जाते हैं। अवसाद की घटना के दौरान मात्र एक प्रतिशत खतरा होता है, जबकि इससे राहत के दौर में खतरा 15 प्रतिशत अधिक बढ़ जाता है।
तकनीक , गैजेट्स और बढ़ता एकांकीपन
हमने सोशल मीडिया को आज के दौर में सबकुछ मान लिया है। हम अब मिलने -जुलने से कतरा रहे है। एक संवादहीनता की दशा हर आम के जीवन में बढ़ती जा रही है। एक ही घर में रह रहे सदस्य अपने अपने गैजेट के साथ इतने बिजी हो जा रहे की उनको एक दूसरे से बात करने का समय नहीं मिल रहा , ऐसे स्थिति में किसी भी प्रकार का उतपन्न तनाव , दुःख शेयर नहीं हो पा रहा। घुटन अवसाद , डिप्रेशन को जन्म दे रहा है, जो आत्महत्या को उकसा रहा। एक परिवार में संवाद की स्थिति किसी भी प्रकार के तनाव को कम करने में जरुरी सिद्ध होता है।
हमारा सफर भी अब बस कैमरे में कैद और सोशल मीडिया में अपडेट करने भर रह गया है. हम एक खूबसूरत जगह पर उपस्थित होकर भी अनुपस्थितं रह जा रहे। यह जाने अनजाने एक खीज उतपन्न करता है जो एक मानसिक तनाव में तब्दील हो जाता है।
निदान -
मानसिक तनाव से बचने के लिए खुद को समय देने की जरुरत है। जब भी आप असामान्य महसूस करे अपने आस पास के लोगो लको बार बार कहे,बाते करे उनसे। बताये , आपको जरुरत है उनकी। चिल्लाये ,चीखे जब तक वह आपकी मदद करने को राजी ना हो जाये। ऐसे समय में अपने आप को कभी भी अकेला न छोड़े। सोशल मीडिया , तकनिकी गैजेट से बचे। संवाद स्थापित करने की कोशिश करे। कम से कम किसी को चाय पर बुला ले। किसी के यहाँ एक कप चाय पर जाये। मैडिटेशन , योगा किसी भी तरह का तनाव , अवसाद को कम करने में सहायक होता है।
“When you get into a tight place and everything goes against you, till it seems as though you could not hang on a minute longer, never give up then, for that is just the place and time that the tide will turn.” – Harriet Beecher Stowe
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gaurow gupta


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