Friday, 14 July 2017

JNU के कन्वेंशन सेन्टर में भिखारी ठाकुर की नाच मंडली की सौंवी सालगिरह का आयोजन

दिनाक 10 जुलाई 2017 को JNU के कन्वेंशन सेन्टर में भिखारी ठाकुर की नाच मंडली की सौंवी सालगिरह मनाई गई।
JNU के कन्वेंशन सेन्टर में श्री जैनेन्द्र दोस्त, जो कि JNU से नाच परंपरा के ऊपर ही अपनी P.hd कर रहे और भिखारी ठाकुर रंग मंडली को पुनर्जीवित किया है, ने जो वार्तालाप का सेशन और सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा वो सराहनीय है। आज जब रंगमंच में इलीट नाटकों का दौर है, उस समय अपनी संस्कृति से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहर का प्रदर्शन अपने आप मे काबिले तारीफ है। श्रीमती सरिता साज़ के लोक गायन से रंगमंच पे रौनक बनी रही। भिकारी ठाकुर के लिखे नाटकों के गीत जैसे बेदिसिया, बेटी बेचवा आदि को सरिता साज़ ने मधुर आवाज दी। 92 वर्षीय, राम चन्द्र मांझी, जो 11 वर्ष की उम्र से ही भिखारी ठाकुर की नाच मंडली के सदस्य रहें, के लौंडा नाच ने समा बाँधा। इस उम्र में भी उनका नाच-गायन और जोश देखने लायक था। देखने वालों के लिए वो एक प्रेरणा स्रोत रहे। रंग मंच का संचालन करते हुए श्री लारैब अकरम, जो JNU की छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं, ने पूरे जोश से अतिथियों और श्रोताओं को संबोधित किया। अतिथियों में संगीत नाटक अकादमी के उप सचिव सुमन कुमार, JNU के अफ्रीकन अध्यन केंद्र विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुबोध नारायण मालाकार, जामिया मिलिया के हिंदी डिपार्टमेंट के चंद्र देव सिंह यादव रहें  और पैनल डिस्कशन को अपने ज्ञान से सुसज्जित किया।

देखने वाली बात ये थी के इस कार्यक्रम को सफल बनाने में जितने लोग लगे रहें वो सब युवा थे। युवाओं में इस कदर का जोश देख के लगता है की भिखारी ठाकुर जैसे समाज सेवक को पढ़ने और जानने वाले युवा आज भी समाज मे सक्रिय हैं। बेटी बेचने की प्रथा, विधवा की दशा, काम की खोज में गांव से बाहर जाने वाले मर्द और उनके घर की दशा, औरत का दर्द, इन सभी सामाजिक कुरीतियों-रीतियों और आर्थिक मजबूरियों पर भिखारी ठाकुर गीत और नाच के जरिये चोट करते रहे। जिस समय भारत मे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छिड़ी थी, उस समय भिखारी ठाकुर अपने समाज के भीतर की कुरीतियों से लड़ रहे थे।
‌श्री भिखारी ठाकुर (१८ दिसम्बर १८८७ - १० जुलाई सन १९७१) भोजपुरी के समर्थ लोक कलाकार, रंगकर्मी लोक जागरण के सन्देश वाहक, नारी विमर्श एवं दलित विमर्श के उद्घोषक, लोक गीत तथा भजन कीर्तन के अनन्य साधक थे। वे बहु आयामी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे भोजपुरी गीतों एवं नाटकों की रचना एवं अपने सामाजिक कार्यों के लिये प्रसिद्ध हैं। वे एक महान लोक कलाकार थे जिन्हें 'भोजपुरी का शेक्शपीयर' कहा जाता है। वे एक ही साथ कवि, गीतकार, नाटककार, नाट्य निर्देशक, लोक संगीतकार और अभिनेता थे। भिखारी ठाकुर बिहार के छप्परा जिले में जन्में। उनकी मातृभाषा भोजपुरी थी और उन्होंने भोजपुरी को ही अपने काव्य और नाटक की भाषा बनाया। उनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ हैं- बिरहा-बहार, विदेशिया, कलियुग बहार, हरिकीर्तन, बहरा-बहार, गंगा-स्नान, विधवा-विलाप, पुत्रवध, ननद-भौजाई, भाई-विरोधी, बेटी-वियोग, नाई बहार, श्रीनाम रत्न, रामनाम माला, शंका समाधान, नर नव अवतार, नक़ल भांड अ नेटुआ के।
भिखारी ठाकुर 
उनके लिखे कुछ गीत : .)हमरा बलमु जी के बड़ी-बड़ी अँखिया से, चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया। ओठवा त बाड़े जइसे कतरल पनवा से, नकिया सुगनवा के ठोर रे बटोहिया। दँतवा ऊ सोभे जइसे चमके बिजुलिया से, मोंछियन भँवरा गुँजारे रे बटोहिया। मथवा में सोभे रामा टेढ़ी कारी टोपिया से, रोरी बूना सोभेला लिलार रे बटोहिया।। .)चलनी के चालल दुलहा, सूप के फटकारल हे, दिअका के लागल बर, दुआरे बाजा बाजल हे। आँवा के पाकल दुलहा, झाँवा के झारल हे; कलछुल के दागल, बकलोलपुर के भागल हे। .)हाय हाय राजा कैसे कटिये सारी रतिया जबले ग‍इले राजा सुधियो ना लिहले, लिखिया ना भेजे पतिया ।। हाय हाय.... हाय दिनवां बितेला सैयां बटिया जोहत तोर, तारा गिनत रतियाँ ।। हाय हाय... जब सुधि आवै सैयां तोरी सुरतिया बिहरत मोर छतिया ।। हाय हाय... नाथ शरन पिया भइले बेदरदा मनलेना मोर बतिया ।। हाय हा एक मिठास, एक आग्रह, एक व्यंग, एक ख़ुशबू दिखती है भिखारी ठाकुर की रचनाओं में।
सिर्फ भूजपुरी और बिहार से भिखारी ठाकुर को जोड़ कर देखना बैमानी होगी। आज जब दुनिया भर में भिखारी ठाकुर के लिखे नाटक और गीत गाये और प्रस्तुत किये जाते हैं तब ज़रूरत है कि देश के युवाओं को भी अपनी सांस्कृतिक, ऐतेहासिक और स्थानीय धरोहर का ज्ञान हो। भिखारी ठाकुर के गीत और नाटक पढ़ के समाज की कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने का जज़्बा और समाज के उज्ज्वल भविष्य की ओर कार्यरत रहने की ताकत मिलती है। उनके जैसे और भी समाज सेवी कलाकारों को आज जानने और समझने की ज़रूरत है, खासकर हमारे युवाओं को।



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