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भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों द्वारा आपराधिक
पृष्ठभूमि के उम्मीदवार को चुनाव में मंत्री,विधायक के संवैधानिक पद के लिए खड़ा किया जाना इस बात का सुबूत है कि उन्होंने खुद ही लोकतंत्र को खोखला करने के लिए आमंत्रण दिया है।
ये राजनीतिक पार्टियां भी अक्सर उन्ही आपराधिक लोगो को चुनाव में टिकट देती है,जिनका समाज मे रसूख,भय और दहशत व्याप्त है।ताकि जनता उन्हें वोट उनकी काबिलियत और ईमानदारी की वजह से नही बल्कि उनके भय पर वोट दे।जब वो सत्ता में आते है,बड़ी शान से शपथ ग्रहण करते समय अपनी आपराधिक रिकॉर्ड का ब्यौरा देते है,और क़र्त्तल ध्वनि से उनका संसद और विधान मंडल में स्वागत भी किया जाता है।
ये भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि यहाँ अपराधीकरण केवल संसद तक ही सीमित नही रहता बल्कि राज्यो में भी मंत्री के शपथ-पत्र में उल्लेख होता है कि उनपर आपराधिक मामलों की सुनवाई चल रही है।
आंकड़ों पर गौर करे तो लोक सभा मे 543 में 184 सांसद(34 फीसदी)के खिलाफ हत्या,अपहरण,महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर आरोप शामिल है।
सभी राज्यों में मिलाकर 600 से अधिक मंत्री है।इनमे से 609 के शपथ पत्रों से पता चलता है कि 201 के खिलाफ आपराधिक मामले है।
कुछ राज्यों के आंकड़े तो और चिंताजनक है।
झारखंड-11 में 9(82 फीसदी),दिल्ली में 7 में 4(57 फीसदी),तेलांगना में 17 में 9 मंत्रियों ने अपने शपथ पत्रों में स्वयं के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का उल्लेख किया है।
बिहार भी इससे अछूता नही है।यहाँ भी 243 में 141(58 फीसदी) के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे है।
ये आंकड़े हमारे राजनीति का वो आईना है,जिसमें लोकतंत्र को सुरक्षित देखने की कल्पना मात्र भी बेमानी होगी।
उम्मीदवार के रूप में राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में खड़ा करते समय उन्हें उन कसौटियों पर भी नही तौला जाता कि वे जीतकर संसद और विधान मंडल में किस प्रकार जनता के कल्याण और राज्य के लोककल्याणकारी उद्देश्य को पूरा करेंगे।
राजनीतिक पार्टियां ये निर्णय लेते समय कभी ये नही सोचती की वे भारतीय लोकतंत्र की अस्मिता और उसकी गरिमा को अपने ओछे राजनीतिक उद्देश्य के लिए किस ओर ले जा रही है।
भारतीय जनता को भी एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में
इन आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार को अस्वीकार करना चाहिए यदि वो वास्तव में अपना और राज्य का विकास चाहते है।लोभ और झांसे से दूर चुनाव में उन्हें अपनी जागरूक उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए।
इस दिशा में संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग को
सुधारात्मक और दंडात्मक कदम उठाए जाने की जरूरत है,जो इस तरह राजनीतिक पार्टियों के आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार को अनदेखा किया जाता है।


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