Saturday, 12 August 2017

सांसद अली अनवर के सस्पेंड होने पर JDU के खिलाफ बिहार भवन के सामने प्रोटेस्ट


नीतीश कुमार के दल बदलू रवैय्ये के खिलाफ मुखर होकर बोलने वाले राज्य सभा के सांसद अली अनवर अंसारी को JD(u) ने पार्लियामेंट्री कमिटी से ससपेंड कर दिया है । ये इसलिए किया गया क्योंकि अली अनवर अंसारी ने ऑल ओप्पोज़िशन मीट (All opposition meet) में हिस्सा लिया। आज शरद यादव का बयान आया है कि अली अनवर को उन्होंने मीट में भेजा था ताकि बिहार ग्रैंड अलायन्स जैसा मॉडल देश के और राज्यों में लाया जा सके।
अली अनवर अंसारी, नीतीश कुमार के bjp के साथ जुड़ने के फैसले के खिलाफ हैं। उनका कहना है की ये पार्टी और उनके सिद्धांतो के अनुकूल नही। अली अनवर अंसारी के साथ खड़े दिल्ली के सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ता लारैब अकरम ने आज 12 अगस्त को दोपहर 2 बजे बिहार भवन, चाणक्यपुरी, दिल्ली में प्रोटेस्ट कॉल किया है। अकरम विगत 10 सालों से दिल्ली में एक स्टूडेंट लीडर और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे हैं। कौनफ्लिक्ट जोन में काम करने वाले अकरम ने नीतीश कुमार की राजनीति को खुली चुनौती देने की ठानी है। अकरम ने भागलपुर घोटाले में सुशील मोदी के रोल पर भी सवाल उठाया है और नीतीश कुमार से जवाब मांगा है कि क्या अब नीतीश अपने डिप्टी CM से इस्तीफा मागेंगे? अकरम ने अपने प्रोटेस्ट के बारे में बताते हुए लिखा है :

we appeal to all democratic forces in Delhi to join a protest against Nitish Kumar’s decision to suspend Ali Anwar just because he raised the question of communalism and sidelining the mandate which reflected people’s aspiration in Bihar within his own party on 12th August, 2017 at Bihar Bhawan (Chanakyapuri)tomorrow at 2 PM. Regards Laraib Akram 9899002996






Sunday, 30 July 2017

राजनीति का अपराधीकरण -जाह्नवी


राजनीति का अपराधीकरण
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भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों द्वारा आपराधिक 
पृष्ठभूमि के उम्मीदवार को चुनाव में मंत्री,विधायक के संवैधानिक पद के लिए खड़ा किया जाना इस बात का सुबूत है कि उन्होंने खुद ही लोकतंत्र को खोखला करने के लिए आमंत्रण दिया है।

ये राजनीतिक पार्टियां भी अक्सर उन्ही आपराधिक लोगो को चुनाव में टिकट देती है,जिनका समाज मे रसूख,भय और दहशत व्याप्त है।ताकि जनता उन्हें वोट उनकी काबिलियत और ईमानदारी की वजह से नही बल्कि उनके भय पर वोट दे।जब वो सत्ता में आते है,बड़ी शान से शपथ ग्रहण करते समय अपनी आपराधिक रिकॉर्ड का ब्यौरा देते है,और क़र्त्तल ध्वनि से उनका संसद और विधान मंडल में स्वागत भी किया जाता है।
ये भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि यहाँ अपराधीकरण केवल संसद तक ही सीमित नही रहता बल्कि राज्यो में भी मंत्री के शपथ-पत्र में उल्लेख होता है कि उनपर आपराधिक मामलों की सुनवाई चल रही है।
आंकड़ों पर गौर करे तो लोक सभा मे 543 में 184 सांसद(34 फीसदी)के खिलाफ हत्या,अपहरण,महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर आरोप शामिल है।
सभी राज्यों में मिलाकर 600 से अधिक मंत्री है।इनमे से 609 के शपथ पत्रों से पता चलता है कि 201 के खिलाफ आपराधिक मामले है।

कुछ राज्यों के आंकड़े तो और चिंताजनक है।
झारखंड-11 में 9(82 फीसदी),दिल्ली में 7 में 4(57 फीसदी),तेलांगना में 17 में 9 मंत्रियों ने अपने शपथ पत्रों में स्वयं के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का उल्लेख किया है।
बिहार भी इससे अछूता नही है।यहाँ भी 243 में 141(58 फीसदी) के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे है।

ये आंकड़े हमारे राजनीति का वो आईना है,जिसमें लोकतंत्र को सुरक्षित देखने की कल्पना मात्र भी बेमानी होगी।
उम्मीदवार के रूप में राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में खड़ा करते समय उन्हें उन कसौटियों पर भी नही तौला जाता कि वे जीतकर संसद और विधान मंडल में किस प्रकार जनता के कल्याण और राज्य के लोककल्याणकारी उद्देश्य को पूरा करेंगे।

राजनीतिक पार्टियां ये निर्णय लेते समय कभी ये नही सोचती की वे भारतीय लोकतंत्र की अस्मिता और उसकी गरिमा को अपने ओछे राजनीतिक उद्देश्य के लिए किस ओर ले जा रही है।
भारतीय जनता को भी एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में
इन आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार को अस्वीकार करना चाहिए यदि वो वास्तव में अपना और राज्य का विकास चाहते है।लोभ और झांसे से दूर चुनाव में उन्हें अपनी जागरूक उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए।
इस दिशा में संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग को 
सुधारात्मक और दंडात्मक कदम उठाए जाने की जरूरत है,जो इस तरह राजनीतिक पार्टियों के आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार को अनदेखा किया जाता है।

-जाह्नवी



Friday, 21 July 2017

आत्महत्या को समझना जरुरी है

           
                                       
                                     

               
               “Never never never give up.” – Winston Churchill
आत्महत्या अखबार के पन्नों पर छपने वाली सामान्य हैडलाइन है। जिसे हम कभी चाव से पढ़ते है कभी यू ही पलट देते है। यह बातें जितनी सामान्य लगती है , उतनी ही असामान्य होती है आत्महत्या करने वाले के जीवन में। 
आपने कभी पशुओं को आत्महत्या करते हुये सुना है, नही ना। पशु यांत्रिक वृति के साथ जन्म लेते है और मर जाते है। उनको एक फिक्स्ड प्रोग्राम मिला होता है जिसके जरिये वो काम करते है। मनुष्य बिना किसी फिक्स्ड प्रोग्राम के जन्म लेता है। वो अपने जीवन की तैयारियां खुद करता है। नये नये इक्षाओं का जन्म परिस्थियों के अनुसार उसके अंदर होता है। उन इक्षाओं की पूर्ति के लिये वो संघर्षरत रहता है। जब तक सारी व्यवस्था उसके साथ होती है , उसके अनुरूप होती है वो ठीक ठाक होता है, और जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल नही होती, उसके हल्के बदलाव से वो व्याकुल होने लगता है। तभी शुरू होता है तनाव, डिप्रेशन और धीरे धीरे वो या तो दूसरे की हत्या कर देता है या फिर अपनी हत्या कर लेता है। दूसरे की हत्या करने से वो डरता है, क्योकि समाज के कड़े कानून उसको डराते है, इसलिये उस परिस्थिति में आत्महत्या करने एक मात्र ऑप्शन दिख रहा होता है। 
मनोविज्ञान और आत्महत्या -
 सुविख्यात फ्रांसीसी समाज शास्त्री एमिल दुर्खिम कहते हैं कि आत्महत्या बहुत कुछ व्यक्ति का समाज के साथ सम्बन्ध, समाज की स्थिरता, अस्थिरता और समाज में संव्याप्त मूल्यों पर निर्भर करती है, जिससे कि व्यक्ति घिरा होता है। इस आधार पर अपनी पुस्तक ‘द स्यूसाइड’ में वह आत्महत्या को 4 रूपों में वर्गीकृत करते हैं, (1) एनामिक स्यूसाइड (2) इगोइस्टिक स्यूसाइड और (3) इल्ट्रइस्टिक स्यूसाइड (4 ) फैटलिस्टिक   स्यूसाइड+
उनके अनुसार एनामिक स्यूसाइड तब होते हैं,(Not enough regulation)-जब सामाजिक संतुलन बुरी तरह से प्रभावित होता है। अमेरिका में 1931 के दौरान ‘ग्रेट डिप्रेशन’ का एक युग आया। जिसमें आत्महत्या की दर 10 से 16 प्रतिशत बढ़ गई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में अपने शत्रु से घिरे आस्ट्रियावासियों में आत्महत्या की यह वृत्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ी थी।
ेगोइस्टिक सुसाइड को समझने के लिए कार्ल मेनिंजर  के व्याख्या को समझना होगा , मेनिंजर के अनुसार जीने की इच्छा ‘सुपर ईगो’ में विद्यमान स्वाभिमान के भाव पर निर्भर करती है। जब यह स्वाभिमान किसी भी कारण वश न्यून हो जाता है, तो आहत व्यक्ति भूखे व परित्यक्त शिशु की स्थिति में स्वयं को पाता है। जो समाविष्ट वस्तु का विनाश चाहता है। आत्महत्या क्षरा उस प्रिय वस्तु के नाश में सफल हो जाता है। जिसके समावेश ने सुपर ईगो की रचना में सहायता की थी। अपनी पुस्तक ‘मैन एगेन्स्ट हिमसेल्फ’ में मेनिंजर लिखते हैं कि व्यक्ति में किसी के प्रति हिंसा की भावना का अंत तीन रूपों में होता है, (1) मारने की इच्छा (2) मारे जाने की इच्छा और (3) मरने की इच्छा।
आत्महत्या का तीसरा स्वरूप है एल्ट्रइस्टिक स्यूसाइड। (Too much integration) किसी समाज या संस्कृति के मूल्य उसके व्यवस्था तंत्र के कारण होते हैं। इन मूल्यों में गड़बड़ी के कारण व्यक्ति समाज या अपने परिवार कुटुँब के बंधनों में इतना जकड़ जाता है कि उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं बचता। अपने देश, जाति व समाज के नाम पर भावावेश में वह प्राणों का उत्सर्ग कर देता है भारत की सतीप्रथा व जापान की हाराकिरी इसके उदाहरण है। वियतनाम युद्ध में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा आत्महत्या व 1907 में जिम जोन के सौ से भी अधिक अनुयायियों द्वारा युयाना में आत्महत्या इसी के अन्य उदाहरण हैं।
 फैटलिस्टिक   स्यूसाइड -(Too much regulation. )- इसमें व्यक्ति अपने आप को पूरी तरह से जकड़ा हुआ पता है। जैसे वह कोई गुलाम हो। 
मनःविशेषज्ञों के अनुसार आत्महत्या एक आक्रमण कृत्य है, जिसमें व्यक्ति का स्वयं को समाप्त करने के पीछे दूसरों को दुख देने का भाव निहित रहता है। सिगमन  फ्रायड ने आत्महत्या पर सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक अध्ययन व शोध किया था। फ्रायड ने इसे आक्रामक वृत्ति का रूप माना है. फ्रायड  के अनुसार मन के तनाव के कारण इंसान जब उसे अविव्यक्त नहीं कर पाता  है तो वह अवसाद ग्रस्त होता है, और यही बोझ उसे  आत्महत्या की ओर  उकसाती है  । 
कार्ल मेनिंजर के अनुसार आत्महत्या व्यक्ति के रचनात्मक पक्ष पर उसके ध्वंसात्मक पक्ष की जीत है।
मनोवैज्ञानिक एल्फ्रेड एडलर आत्महत्या के कारण के रूप में मन में चल रहे द्वंद्वों की अपेक्षा व्यक्ति एवं समाज के बीच संबंधों को अधिक महत्व देते हैं। सामाजिक संबंध के बिना जीवन निरर्थक एवं निरुद्देश्य हो जाता है और आत्महत्या की ओर प्रेरित होता है।
मानव मन के मर्मज्ञ बौमेस्टर आत्महत्या को स्व से बचने या भागने का प्रयास का परिणाम मानते हैं। अपनी गलतियों कमियों व दुर्बलताओं के असहनीय अनुभवों के बोध से भागते ऐसे लोग अंततः ऐसी स्थिति में प्रवेश कर जाते हैं, जिसमें आत्महत्या के दुष्परिणाम के बारे में सोचने का अधिक श्रम करने की परवाह नहीं करते।
सुविख्यात मनीषी रोला के अनुसार मृत्यु ही जीवन को पूर्ण मूल्य देती है। अतः मृत्यु की निश्चितता हमें जीवन को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित करती है, जिससे कि हम अपनी क्षमताओं व शक्तियों का अधिकतम विकास व उपयोग कर सकें। इस संदर्भ में आत्महत्या जीवन से हार व इसे वृथा बरबाद करने का कृत्य है, क्योंकि इससे जीवन की समूची क्षमताओं की अनुभूति पर तुषारापात हो जाता है।
ब्राँस के अनुसार सभी आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि छोटी -छोटी आत्महत्याओं द्वारा बनती है। जिनमें व्यक्ति दूसरों से कटता जाता है, जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेता है और जीवन मूल्यों की खोज बंद कर देता है। इस तरह आत्महत्या का अंतिम कुकृत्य अवास्तविक निर्णयों की एक लंबी शृंखला का परिणाम होता है।
एबनॉर्मल साइकोलॉजी इरविन और बखरा सरासान लिखते हैं कि 9 प्रतिशत व्यक्ति आत्महत्या करते समय किसी न किसी मनोरोग के शिकार होते हैं। मनोरोग में अवसाद व मूढ़ विकास को प्रमुख कारण माना गया है। इसके बाद व्यक्तित्व दोष एवं मादक द्रव्यों के सेवन को भी आत्महत्या का प्रमुख कारण बतलाया गया है। व्यक्तित्व दोष में समस्या के समाधान में अक्षमता, रचनात्मक दृष्टिकोण का अभाव, बिगड़े अंतर्वैयक्तिक संबंध, शरीर व मनःरोगों पर नियंत्रण का अभाव, सामाजिक सामंजस्य का अभाव आदि हो सकते हैं। अमेरिका में ऐसे 2379 व्यक्तियों पर किए गए अध्ययन के दौरान पाया गया है कि इनमें 98 प्रतिशत किसी न किसी प्रकार से रुग्ण थे। इनमें 94 प्रतिशत मनःरोग से पीड़ित थे।
एक आश्चर्यजनक तथ्य अध्ययन के दौरान उभरकर आया है कि अवसाद की गहनतम दशा से उबरने के दौरान ही आत्महत्या के अधिकाँश निर्णय लिए जाते हैं। अवसाद की घटना के दौरान मात्र एक प्रतिशत खतरा होता है, जबकि इससे राहत के दौर में खतरा 15 प्रतिशत अधिक बढ़ जाता है।

तकनीक , गैजेट्स और बढ़ता एकांकीपन 
हमने सोशल मीडिया को आज के दौर में सबकुछ  मान   लिया है।  हम अब मिलने -जुलने से कतरा रहे है।  एक संवादहीनता की दशा हर आम के जीवन में बढ़ती जा रही है।  एक ही घर में रह रहे सदस्य अपने अपने गैजेट के साथ इतने बिजी हो जा रहे की उनको एक दूसरे से बात करने का समय नहीं मिल रहा , ऐसे स्थिति में किसी भी प्रकार का उतपन्न तनाव , दुःख शेयर नहीं हो पा रहा।  घुटन अवसाद , डिप्रेशन को जन्म दे रहा है, जो आत्महत्या को उकसा रहा।  एक परिवार में संवाद की स्थिति किसी भी प्रकार के तनाव को कम करने में जरुरी सिद्ध होता है। 
हमारा सफर भी अब बस कैमरे  में कैद और सोशल मीडिया में अपडेट करने भर रह गया है. हम एक खूबसूरत जगह पर उपस्थित होकर भी अनुपस्थितं रह जा रहे।  यह जाने अनजाने एक खीज उतपन्न करता है जो एक मानसिक तनाव में तब्दील हो जाता है। 

                                     
                                          

निदान - 

मानसिक तनाव से बचने के लिए खुद को समय देने की जरुरत है।  जब भी आप असामान्य महसूस करे अपने आस पास के लोगो लको बार बार कहे,बाते करे उनसे। बताये , आपको  जरुरत है उनकी। चिल्लाये ,चीखे जब तक वह आपकी मदद करने को राजी ना हो जाये।   ऐसे समय में अपने आप को कभी भी अकेला न छोड़े।  सोशल मीडिया , तकनिकी गैजेट से बचे।  संवाद स्थापित करने की कोशिश करे।  कम से कम किसी को चाय पर बुला ले।  किसी के यहाँ एक कप चाय पर  जाये।  मैडिटेशन ,  योगा   किसी भी  तरह  का  तनाव  ,  अवसाद को कम करने में सहायक होता है। 

 “When you get into a tight place and everything goes against you, till it seems as though you could not hang on a minute longer, never give up then, for that is just the place and time that the tide will turn.” – Harriet Beecher Stowe

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                                           gaurow gupta


Monday, 17 July 2017

भरोसा इंडेक्स में भारत का स्थान प्रथम

सरकार भरोसे पर चल रही, इसमे चिल्लम-पो क्या करना। भारत मे सबसे ज्यादा उत्पाद भरोसे का होता है, सबसे ज्यादा खपत भी भरोसे का ही होता है। हम सदियों से यह भरोसा करते आ रहे कि इक्षाधारी नागिन होती है और आज भी इसी भरोसे के कारण भारतीय सीरियल में सबसे ज्यादा टी आर पी बटोरने वाली सीरियल नागिन 1 और नागिन 2 है, औऱ दर्जनों फ़िल्म, सीरियल बनते आ रही है।
हमे भरोसा है कि पृथ्वी के अंत तक "भरोसा" ही भरोसे के काबिल है। पूरब भूत से जितना मोह करता है उतना ही आशाएँ भविष्य से रखता है।। और पश्चिम वर्तमान को महत्व देता है।
इसलिये पूरब में संग्रह करने की क्षमता है।इसलिये तो हम कूड़े वाले को भी कूड़ा देते वक्त कुछ सामान छांट लेते है कि क्या पता कल काम आ जाये.. फिर एक बड़ा सा स्टोर रूम में ऊंघता समान कल अपने उपयोग में आने का इंतजार कर रहा होता है।
और सरकार तो भारतीयों की नब्ज अच्छे से पकड़ती है इसलिये तो आने वाले समय मे " अच्छे दिन" का भरोसा देती रही है। नोटबन्दी के समय मे ट्रेन में सफर करते हुये एक सज्जन बार बार यही कह रहे थे- आने वाले समय मे अच्छा होगा, मुझे भरोसा है। मैंने पूछा - क्या अच्छा होगा? बोले जो होगा सो अच्छा होगा, आप देखते जाइये.. मैं अभी तक देख रहा हूँ.. क्योकि मुझे भी उसके भरोसे पर भरोसा था।
15 लाख वाला जिक्र करके मैं सरकार विरोधी नही बनना चाहता। मैं अपने को 73% भारतीय से अलग क्यो रखूं।
कल एक महोदय बीच सड़क पर अपने व्हाइट ह्युंडई कार का गेट खोलकर पच्च से पान का पीक फेंककर तारकोल की सड़क को लाल कर दिए, और चलते बने... मुझे भरोसा था एक दिन सारे भारतीय स्वच्छता अभियान को सफल बनाएंगे। 

हमे भरोसा है भारतीय रेल समय से गुजरेगी..

हमे भरोसा है बेरोजगारी किसी रोज हमसे बहुत दूर चली जायेगी...
हमे भरोसा है गरीबी को हम यहाँ वहाँ ढूंढते फिरेंगे... 
हमे खूब भरोसा है...

अक्सर ट्रैन बसों में.. तांत्रिक बंगाली बाबा के पोस्टरों को देखता हूँ जिसमें 100% भरोसा दिया जाता है कि आप सौतन से छुटकारा पा सकते है, प्रेम विवाह में सफलता पा सकते है, मनचाहा नौकरी भी पा सकते है.. जिसे अब तक सरकार देने में असमर्थ रही है वो बाबाओं के शरण मे आप आसानी से पा सकते है।
Tv चैनलो पर बाबा जब घर के पश्चिम के कोने में रखे जूते से आपके इस वर्ष नौकरी का संयोग नही होने की बात बताते है तो मैं "भरोसामय" हो जाता हूँ.. समस्या है तो समाधान कोई ना कोई तो बेचेगा ही.. आपको उसके पैकेजिंग पर भरोसा क्यों ना हो... किसी दिन बाबा बोले कि बिना फॉर्म भरे भी आपको नौकरी का लेटर आ सकता है.. तो मैं एक किलो मोतीचूर का लड्डू खुद लेकर जाऊ उनतक...

किसी इंडेक्स में तो भारत ऊपर है, और आप खामखाँ परेशान है। धत्त......
ॐ भरोसाय नमः

- by Gaurow gupta




Friday, 14 July 2017

JNU के कन्वेंशन सेन्टर में भिखारी ठाकुर की नाच मंडली की सौंवी सालगिरह का आयोजन

दिनाक 10 जुलाई 2017 को JNU के कन्वेंशन सेन्टर में भिखारी ठाकुर की नाच मंडली की सौंवी सालगिरह मनाई गई।
JNU के कन्वेंशन सेन्टर में श्री जैनेन्द्र दोस्त, जो कि JNU से नाच परंपरा के ऊपर ही अपनी P.hd कर रहे और भिखारी ठाकुर रंग मंडली को पुनर्जीवित किया है, ने जो वार्तालाप का सेशन और सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा वो सराहनीय है। आज जब रंगमंच में इलीट नाटकों का दौर है, उस समय अपनी संस्कृति से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहर का प्रदर्शन अपने आप मे काबिले तारीफ है। श्रीमती सरिता साज़ के लोक गायन से रंगमंच पे रौनक बनी रही। भिकारी ठाकुर के लिखे नाटकों के गीत जैसे बेदिसिया, बेटी बेचवा आदि को सरिता साज़ ने मधुर आवाज दी। 92 वर्षीय, राम चन्द्र मांझी, जो 11 वर्ष की उम्र से ही भिखारी ठाकुर की नाच मंडली के सदस्य रहें, के लौंडा नाच ने समा बाँधा। इस उम्र में भी उनका नाच-गायन और जोश देखने लायक था। देखने वालों के लिए वो एक प्रेरणा स्रोत रहे। रंग मंच का संचालन करते हुए श्री लारैब अकरम, जो JNU की छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं, ने पूरे जोश से अतिथियों और श्रोताओं को संबोधित किया। अतिथियों में संगीत नाटक अकादमी के उप सचिव सुमन कुमार, JNU के अफ्रीकन अध्यन केंद्र विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुबोध नारायण मालाकार, जामिया मिलिया के हिंदी डिपार्टमेंट के चंद्र देव सिंह यादव रहें  और पैनल डिस्कशन को अपने ज्ञान से सुसज्जित किया।

देखने वाली बात ये थी के इस कार्यक्रम को सफल बनाने में जितने लोग लगे रहें वो सब युवा थे। युवाओं में इस कदर का जोश देख के लगता है की भिखारी ठाकुर जैसे समाज सेवक को पढ़ने और जानने वाले युवा आज भी समाज मे सक्रिय हैं। बेटी बेचने की प्रथा, विधवा की दशा, काम की खोज में गांव से बाहर जाने वाले मर्द और उनके घर की दशा, औरत का दर्द, इन सभी सामाजिक कुरीतियों-रीतियों और आर्थिक मजबूरियों पर भिखारी ठाकुर गीत और नाच के जरिये चोट करते रहे। जिस समय भारत मे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छिड़ी थी, उस समय भिखारी ठाकुर अपने समाज के भीतर की कुरीतियों से लड़ रहे थे।
‌श्री भिखारी ठाकुर (१८ दिसम्बर १८८७ - १० जुलाई सन १९७१) भोजपुरी के समर्थ लोक कलाकार, रंगकर्मी लोक जागरण के सन्देश वाहक, नारी विमर्श एवं दलित विमर्श के उद्घोषक, लोक गीत तथा भजन कीर्तन के अनन्य साधक थे। वे बहु आयामी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे भोजपुरी गीतों एवं नाटकों की रचना एवं अपने सामाजिक कार्यों के लिये प्रसिद्ध हैं। वे एक महान लोक कलाकार थे जिन्हें 'भोजपुरी का शेक्शपीयर' कहा जाता है। वे एक ही साथ कवि, गीतकार, नाटककार, नाट्य निर्देशक, लोक संगीतकार और अभिनेता थे। भिखारी ठाकुर बिहार के छप्परा जिले में जन्में। उनकी मातृभाषा भोजपुरी थी और उन्होंने भोजपुरी को ही अपने काव्य और नाटक की भाषा बनाया। उनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ हैं- बिरहा-बहार, विदेशिया, कलियुग बहार, हरिकीर्तन, बहरा-बहार, गंगा-स्नान, विधवा-विलाप, पुत्रवध, ननद-भौजाई, भाई-विरोधी, बेटी-वियोग, नाई बहार, श्रीनाम रत्न, रामनाम माला, शंका समाधान, नर नव अवतार, नक़ल भांड अ नेटुआ के।
भिखारी ठाकुर 
उनके लिखे कुछ गीत : .)हमरा बलमु जी के बड़ी-बड़ी अँखिया से, चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया। ओठवा त बाड़े जइसे कतरल पनवा से, नकिया सुगनवा के ठोर रे बटोहिया। दँतवा ऊ सोभे जइसे चमके बिजुलिया से, मोंछियन भँवरा गुँजारे रे बटोहिया। मथवा में सोभे रामा टेढ़ी कारी टोपिया से, रोरी बूना सोभेला लिलार रे बटोहिया।। .)चलनी के चालल दुलहा, सूप के फटकारल हे, दिअका के लागल बर, दुआरे बाजा बाजल हे। आँवा के पाकल दुलहा, झाँवा के झारल हे; कलछुल के दागल, बकलोलपुर के भागल हे। .)हाय हाय राजा कैसे कटिये सारी रतिया जबले ग‍इले राजा सुधियो ना लिहले, लिखिया ना भेजे पतिया ।। हाय हाय.... हाय दिनवां बितेला सैयां बटिया जोहत तोर, तारा गिनत रतियाँ ।। हाय हाय... जब सुधि आवै सैयां तोरी सुरतिया बिहरत मोर छतिया ।। हाय हाय... नाथ शरन पिया भइले बेदरदा मनलेना मोर बतिया ।। हाय हा एक मिठास, एक आग्रह, एक व्यंग, एक ख़ुशबू दिखती है भिखारी ठाकुर की रचनाओं में।
सिर्फ भूजपुरी और बिहार से भिखारी ठाकुर को जोड़ कर देखना बैमानी होगी। आज जब दुनिया भर में भिखारी ठाकुर के लिखे नाटक और गीत गाये और प्रस्तुत किये जाते हैं तब ज़रूरत है कि देश के युवाओं को भी अपनी सांस्कृतिक, ऐतेहासिक और स्थानीय धरोहर का ज्ञान हो। भिखारी ठाकुर के गीत और नाटक पढ़ के समाज की कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने का जज़्बा और समाज के उज्ज्वल भविष्य की ओर कार्यरत रहने की ताकत मिलती है। उनके जैसे और भी समाज सेवी कलाकारों को आज जानने और समझने की ज़रूरत है, खासकर हमारे युवाओं को।



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सांसद अली अनवर के सस्पेंड होने पर JDU के खिलाफ बिहार भवन के सामने प्रोटेस्ट

नीतीश कुमार के दल बदलू रवैय्ये के खिलाफ मुखर होकर बोलने वाले राज्य सभा के सांसद अली अनवर अंसारी को JD(u) ने पार्लियामेंट्री कमिटी से सस...